जुनून में सुकून 2

दोस्तों! इस हिस्से में हम ये जानेंगे की, स्नेहा काम पर अगले दिन क्यों नहीं जाती?? 
स्नेहा काम पर जब पहले दिन जाती है तो किराने की दुकान का मालिक उसे गलत तरह से छुता है और स्नेहा के साथ गलत करने की कोशिश करता है।

स्नेहा वहाँ से नौकरी छोड़ देती है, और दूसरी नौकरी की तलाश करने लगती है। कुछ दिन तक स्नेहा को नौकरी नहीं मिलती, तब तक स्नेहा घर में अपनी डायरी में लिखना शुरू करती है, और वो बाते लिखती है, जो काफी अरसे से उसके जहन में थी, उन सभी बातो को स्नेहा अपने शब्द दे देती है।
स्नेहा को लिखने का धीरे धीरे आदत हो जाती है, और वो आदत कुछ इस क़दर बढ़ जाती है, की वो जिस रात ना लिखे उसे चैन नहीं मिलता।

एक रोज़ जब वह नौकरी की तलाश में निकलती है तो उसे किसी तरह डॉमिनोज में नौकरी मिल जाती है, वहाँ उसे ऑर्डर लेने के काम मिल जाता है। स्नेहा दिन में काम किया करती, और रात में अपनी डायरी लिखा करती थी।
उसकी जिदंगी जैसे नौकरी और डायरी के बीच ही सिमटी हुई थी, ना कोई दोस्त ना कोई प्यार।
अपने मां-पापा की मौत के बाद स्नेहा गुमसुम रहने लगी थी। लेकिन शायद उसका ये अकेलापन जल्द ही भरने वाला था।

एक रोज़ एक लड़का अपने कुछ दोस्तों को पार्टी देने डॉमिनोज जाता है, इस लड़के का नाम आदित्य होता है, आदित्य पिज़्ज़ा का ऑर्डर देने काउंटर पर जाता है, जैसे ही ऑर्डर देने लगता है, उसकी नजर स्नेहा पर पड़ती है, जो सबके ऑर्डर को रि-चेक कर रही होती है। 
आदित्य को स्नेहा से पहली ही नज़र में प्यार हो जाता है, और अब वो स्नेहा से मिलने के बहाने रोज़ डॉमिनोज आने लगता है, और जान बूझकर ऑर्डर स्नेहा को ही लेने को कहता है। धीरे-धीरे बातचीत करते-करते स्नेहा और आदित्य की दोस्ती हो जाती है।

अब आदित्य और स्नेहा अब बहार भी मिलने लगते हैं, इसी बीच कुछ दिन स्नेहा काम पर जा नहीं पाती, तो आदित्य परेशान हो जाता है और डॉमिनोज के आउटलेट  के मालिक से स्नेहा के घर का पता ले कर स्नेहा से मिलने जाता है।

जब वो उसके घर पहुंचता है, तो देखता है, कि वो बीमार है, और आराम कर रही है। आदित्य को अपने घर पर अचानक देख कर स्नेहा थोड़ी अनकम्फर्टेबल हो जाती है, और पूछती है "अरे! आदित्य तुम यहां क्यों आगये ?? आदित्य जवाब देता है "तुमसे मिलने आया हूँ, क्यों नहीं आ सकता क्या?" , इस पर स्नेहा हंसकर कहती हैं, "नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, अच्छा तुम बैठो मैं पानी लाती हूँ"।  इतना कह कर स्नेहा आदित्य के लिए पानी लेने के लिए किचन में जाती है। 
जैसे ही स्नेहा रसोई में जाती है आदित्य की नजर स्नेहा की डायरी पर पड़ती है। आदित्य उस डायरी को उठा कर पढ़ने वाला ही होता है स्नेहा तब तक पानी ले कर आ जाती है। आदित्य डायरी छिपा लेता है और अपने घर जा कर डायरी पढ़ता है। डायरी पढ़ते-पढ़ते उसके होश उड़ जाते है। 

लेकिन उस डायरी में ऐसा क्या था? ये हम कहानी के अगले हिस्से में हम जानेंगे की आदित्य डायरी में ऐसा क्या पढ़ता है?? जिससे उसके होश उड़ जाते है।

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अगर किसी वजह से आपने कहानी का पहला भाग मिस किया हो तो , नीचे दिए गए  लिंक से आप पहला भाग पढ़ सकते हैं। 

जुनून में सुकून (भाग - 1)

धन्यवाद 🙏
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जुनून में सुकून

"जुनून " ये ऐसा शब्द है
जिसका सभी की ज़िन्दगी में अलग अलग मतलब होता है।
या यूं कहे कि सबके लिए जुनून को लेकर अपनी अलग अलग ही परिभाषा है।
तो आज हम जो कहानी जानने वाले है उसमे एक लड़की है

इस लड़की का नाम है स्नेहा !

स्नेहा बहुत ही शांत स्वभाव की लडकी है, उसे कम बोलना पसंद है।
लेकिन जैसी  बाहर की दुनिया के लिए शांत है उसके अंदर उतना ही शोर है

बाहर जितनी शांति है
अंदर उतना शोर है।
अकेली मै नहीं,
 शायद कोई ओर है।
दुनिया कहे ये तो कोई रोग है।

ख़ैर स्नेहा को किसी के कहने पर ज़रा भी बुरा नहीं लगता है,
इतनी कम उम्र में मानो, उसे दुनिया भर की समझदारी थी
थोड़ी शांत , पर बहुत प्यारी थी।

स्नेहा के घर में उसके पिता और माता जी  होते है ।
और दोनों काम करते है


पिता जी एक किराने की दुकान पर समान तोलने का काम करते है,
और माता जी घरो में साफ सफाई का काम करती है,
जिसने उनके घर का खर्चा चलता है।

स्नेहा दिन में स्कूल से आने के बाद अपने घर का काम किया करती थी,
और अपनी मां के आने से पहले काफी काम निपटा दिया करती थी।
और शाम को अपने पिता के पास दुकान पर जाया करती थी और उनके साथ भी काम में हाथ बटाया करती थी और  रात में अपनी पढ़ाई किया करती थी।

स्नेहा के माता पिता उसके लिए चिंतित थे। क्युकी स्नेहा को अनिंद्रा ( रातों में नींद ना आने की बीमारी)

वैसे वो किसी से ज्यादा बात पसंद नहीं करती थी, मगर उसके अंदर बातो का तूफान चला करता था।

स्नेहा अपने माता पिता की इकलौती बच्ची होती है। और उसके परिवार में सिर्फ मा और पापा ही है

उसके पिता जी ने उसकी पढ़ाई में किसी चीज की कमी नहीं होने दी
सब कुछ ठीक ही चल रहा था,
स्नेहा बहुत खुशमिजाज लडकी थी
और सभी से बड़े ही तमीज से बात करती है।


सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक उस परिवार की खुशी को मानो किसी की नज़र लग गई हो

एक  सड़क हादसे में स्नेहा के माता-पिता की मौत हो जाती है, और स्नेहा अकेली हो जाती है।

स्नेहा के माता पिता के  देहांत के बाद स्नेहा के घर पर किराने की दुकान का मालिक आता है

और वह स्नेहा को अपने पिताजी की जगह काम करने का ऑफर देते है
स्नेहा अपने पिता जी की तरह मेहनत करके कमाने वाली लड़की होती है।

वह अगले दिन से दुकान पर पहुंच जाती है। लेकिन कुछ दिन बाद काम पर जाना छोड़ देती है 


वो अगले दिन काम पर क्यों नहीं जाती?
अब अपने घर को उसे खुद ही संभालना है।।
आखिर स्नेहा काम पर जाना क्यों छोड़ देती है???? 

 इस बात को हम जनानेगे कहानी के दूसरे हिस्से में.........



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लाज़वाब हो तुम

मेरे अल्फ़ाज़ की शायरा हो तुम।
डूबते हुए TJ's का हौसला हो तुम।
मेरे इस मिजाज़ का अंदाज़ हो तुम।
वैसे तो चेहरे से ही नहीं, बल्कि दिल से भी खूबसूरत हो तुम।
यू तो हाज़िर जवाब हो तुम।
जो भी हो आखिर लाजवाब हो तुम।
यूं तो गुस्से में आग हो तुम,
पर मेरा चिराग हो तुम।
जो भी हो आखिर लाजवाब हो तुम।
ऐसे तो चेहरे से नवाब हो तुम।
या यूं कहिए कि मेरा ख्वाब हो तुम।
वैसे तानी का तारा हो तुम।
एक प्यारा सा एहसास हो तुम।
कैसे बयां करू तुम्हे, कि क्या हो तुम।
मेरे इस गीत के अल्फ़ाज़ हो तुम।
जो भी हो आखिर लाजवाब हो तुम।


जय और सचिन की आखिरी मुलाकात


जय सचिन के घर जाकर ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा बजाने लगता है
सचिन दरवाज़ा खोलता है।।
अरे जय तुम..... कैसे हो। इतना कह कर सचिन जय को गले लगाने के लिए आगे बढ़ता है, मगर जय सचिन को धक्का देता है और चिल्ला कर पूछता है "अदिति से आखिरी बार तुम मिले थे। क्या किया?? तुमने उसके साथ??"... 

सचिन जय को शांति से बैठने के लिए कहता है, और कहता है कि "जय आज अदिति की फिकर हो रही है।जब वो ज़िंदा थी तब नहीं हुई? कितनी बदली अदिति तुम्हारे लिए...और एक तुम कल भी वैसे थे आज भी वैसे ही हो। तुम्हे बातों और इंसान को समझना नहीं आता"। 

और हां जय एक बात और :-
"जहां प्यार होता, वहीं झुकाव होता है, 
वरना अकड़ भरी इस दुनिया में, कहां कोई बदलाव होता है"

और सचिन कहता है "हाँ! मैं अदिति से मिलने गया था । क्यूँकि मुझे डर था कि अदिति तुम्हारी शादी की खबर सुन कर कुछ गलत ना कर ले, सिर्फ उसे समझाने उसके घर गया था"।

जय पलट कर पूछता है कि "समझाने गया था या प्यार करता था?" इस पर सचिन ने कहा "प्यार करता था और प्यार तेरी समझ के बाहर है" तू क्या जाने सच्चा प्यार जय, तुझे पता भी है अदिति तेरे पास आने के लिए सड़क पर पागलों की तरह पैदल ही निकल गई थी। मैने अदिति को समझाया और अपने साथ चलने के लिए मनाया
तेरे पास ही लाने ही वाला था, हम दोनों अदिति के घर से निकल ही रहे थे कि अचानक अदिति ने मुझसे कहा कि सचिन मझे जय को एक डायरी देनी है जो मैं घर भूल आयी हूँ। और अदिति गाड़ी से उतर कर सड़क पार करके डायरी लेने घर जा ही रही थी कि अचानक एक गाड़ी ने उसे पीछे से टक्कर मार दी।  मैं अदिति को अस्पताल ले कर जा रहा था कि ज्यादा खून बह जाने की वजह से बीच रास्ते में उसकी मौत हो गई"।
ये बताते बताते सचिन की आँखों में आंसू आजाते हैं, और वो कहता है "अदिति तुमसे बहुत प्यार करती थी जय।
तुम किस्मत वाले थे जय..... जो तुम्हे सच्चा प्यार  करने वाली अदिति जैसी लड़की मिली, पर तुम समझ नहीं पाए, और तो और जय तुमने तो अदिति से बात तक करनी छोड़ दी थी, फिर जीकर करती भी क्या बेचारी"

"मरने के बाद रोने से अच्छा है, जीते जी बात की जाए
थोड़ी देर ही सही, अपनों से मुलाकात की जाए"

जय रोते रोते सचिन को डायरी दिखता है, और कहता है "अदिति मझे ये  डायरी देना चाहती थी। जिसमें अदिति का हाल उसकी शब्दों के द्वारा साफ साफ पढ़ा जा सकता था"।

सचिन जय को संभलता है , और कहता है कि जय जब इंसान होता है तब क़दर नहीं होती। अब जब तुम्हे अपनी गलती का एहसास है तो अदिति इस दुनिया में नहीं है। अदिति हमारे बीच ही है हम सबके दिल में। 
जय रोते हुए कहता है.. की सचिन मै उससे माफी भी नहीं मांग पाया"। 

इस पर सचिन ने कहा कि जय  "अदिति ने तुम्हे उस दिन ही माफ कर दिया था। मरने से पहले अदिति ने मुझसे कहा था कि जय से कहना कि मैने जय को माफ किया, अदिति बहुत साफ दिल की थी जय"। 

जय अब सचिन के गले लग कर ...खूब रोने लगता है।

किसी ने सच ही कहा है। कि ताजमहल सबने देखा है पर मुमताज़ ने नहीं।

"इसलिए वक़्त रहते अपनों की कद्र करो।
आप लोग भी अपनों को वक़्त रहते प्यार और सम्मान दे। 
क्यूंकि जब इंसान अपनो को वक़्त नहीं देता
तो अपनों के बीच से वक़्त निकल जाता है।"

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कहानी का दूसरा हिस्सा👇


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