कौन हूं मै??

जिंदगी को देख हैरान हूं मै
हां सच है, बहुत परेशान हू 
चुप हूं अगर मै,
तो सबको लगता है नादान हूं मैं..

दुनिया की इस रीत से शायद अनजान हूं मै
खामोशी जरूरी है, मगर दर्द मुझे भी होता है
क्युकी आखिर में इंसान हूं मै..

कुछ गमों को सीए रहती हु दिल में,
दिल उदास है, फिर भी मुस्कुरा देती हु
और लोगो को लगता है, खुश हूं मै

लिख कर दर्द बयां करना,
अब जरूरी है जैसे
और सबको लगता है
इतना दर्द कैसे? लिख लेती हूं मै

ना शिकायत किसी से,
ना जरूरत किसी की,
पन्नो पर उतरते है, कुछ जस्बात मेरे,
जैसे लिखने के लिए बनी हूं मै

अंत में बस ये ही बताना है की कौन हूं मैं
 ये मै ,कोई और नहीं,
हर एक के अंदर छुपा दर्द हूं, मै

कुछ लिख कर बता जाती हूं,
कुछ यूं बेवजह हक जता देती हूं
दिल टूटने पर भी, 
जो जिंदा लाश है, वो इंसान हूं मै

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निभाना कोई नही चाहता

प्यार सब पाना चाहते है
पर निभाना कोई नही चाहता।

पास सब आना चाहता है,
हक भी सब जताते है,
पर हक देना, कोई भी चाहता...

दर्द सबके दिल में है,
मगर बताना कोई नही चाहता।।

रूठे है सब इस दुनिया में,
मगर मनाना कोई नही चाहता।।

अकेले है सब,
पर साथ कोई आना नही चाहता।।

खुदकुशी कर लेते है, मगर
खुद की खुशी के लिए,  
खुद को जानना तक भी,कोई नही चाहता।।

दिल तो सबका दुखा है,मगर इस दुनिया में,
दूसरी बारी आजमाना कोई नही चाहता।।

उलझे हैं सब यहां मगर, 
सुलझाना कोई नही चाहता।।

सुनाते है सब,
मगर सुनना कोई नही चाहता।।

कहते है सब हम तुम्हारे साथ है,
मगर साथ कोई देना भी नही चाहता।।

प्यार पाना तो सब चाहते है
पर निभाना कोई नही चाहता।।


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कोरोना का काल

कोरोना का  ये ,काल है।
जग में हुआ बुरा हाल है।
वोहान (चाइना) ने चलाया खंजर है।
मौत के दौर सा हो गया, चारो तरफ का मंजर है।

इंसान अपने ही घर में कैद परिंदा सा है।
तो किसी के घर में फैला मातम सा है।
कोई छत के नीचे, निराश होकर बैठ गया है।
तो कोई चिता में लगी,आग के नीचे लेट गया है।

कोई उदास है बेरोजगारी के चलते,
ये कैसे बीमारी है,(सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से)
जब मौत पर भी, अपने गले तक नहीं हैं मिलते।
 
किसकी अंतिम विदाई है,
तो ना जाने अगली बारी, किसकी आई है
देहांत की खबर, अब हर जगह से आई है
किसी को घर में तड़पते देख रहे है,
(ऑक्सीजन की कमी की वजह से)
तो ना जाने कितनो की अर्थी  खुद डॉक्टरों ने जलाई है

किसकी गलती है, किसकी नहीं,
ना जाने कितनो को इस गलती की सजा सुनाई है।
अपनो से ही दूर हो गए, ऐसी क्या रुसवाई है।
हर तरफ, इस बीमारी ने,ये कैसी आफत मचाई है।

डॉक्टर नर्स भी परेशान है,
किस पर दे सबसे ज्यादा ध्यान,
हर तरफ तो तड़प रहा है इंसान ।
ना कोई अप्रोच, अब तो  पैसा भी ना आता काम है।

अब भी किसी को बाहर जाना है
तो किसी के लिए बीमारी का ड्रामा है, ये बहाना है
खुद ही सोचो, कितने लोग चले गए
क्या आपको भी ऊपर जाना है..??
(जो लोग अब भी मज़ाक समझते है इस बीमारी को )

कोरोना का ये काल है
जग में मचा बुरा हाल है
अंत में बस इतना ही, कि
घर में रहना है, बीमारी को पास ना लाना है
ना ही खुद,कोरोना से मिलने बाहर जाना है।




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उम्मीद है कि आप सभी स्वस्थ होंगे, ऊपर वाले की कृपा आप सभी पर बनी रहे।
एवम जिनके अपने नहीं रहे उनके लिए सहानुभूति , एवम मै प्रार्थना करती हू कि भगवान  उनकी आत्मा को शांति दे।🙏

लड़की का जीवन ऐसा क्यों???

ज़िंदगी मिली है एक, तो बार-बार सोचूं क्यों?
कभी किसी रिश्ते से,
तो कभी किसी अजनबी से डरना क्यों??
आज़ाद पंछी की तरह मै, फिरू ना क्यों?
आखिर लड़की का जीवन इतना कठिन है क्यों?

दुनिया की सोच इतनी छोटी है, क्यों?
और,मैं अगर बदलाव की बात करू,
तो उस बदलाव के लिए, मेरी उम्र कम है क्यों??
और अगर उम्र कम है,तो समाज में बालविवाह होते है क्यों???
आखिर लड़की का जीवन ऐसा होता है क्यों???

ज़िंदगी जीने का हक़ देता है, ये रब सबको,
फिर सिर्फ लड़कियों के हक़ को मारते हैं क्यों??
आखिर लड़की का जीवन इतना कठिन है क्यों???

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का फिर ये झूठा नारा क्यों?
पढ़ने वाले हाथो में किताब की जगह, मेंहदी और
शादी का जोड़ा देते हो क्यों??
आखिर लड़की का जीवन इतना बेबस है क्यों???

जब ज़िंदगी मिली एक, तो बार—बार सोचना क्यों?
दर्द भरी आवाज के पीछे, झूठी हसी से हंसना है क्यों??
जब काबिल बन कर खुद को संभाल सकती है,
फिर दुनिया की फिकर, या शादी की, ज़िद्दी है क्यों??
आखिर लड़की का जीवन इतना कठिन है क्यों?????

शादी के बाद खुद के  बजाए, पति और बच्चों के लिए जीना है,
तो फिर, जीवन दूसरे के लिए कह कर, 
खुद का जीवन जियो.. ऐसी प्रेरणा का झूठा ढोंग है क्यों??

सपनो को पूरे करवाने की बात करते है, 
फिर सपनो के आड़े, खुद ही आते है,क्यों??
आखिर में एक लड़की एक बेटी से एक पत्नी और मां का सफर ही तो तय करती है, 
उसकी  ज़िंदगी केवल इतनी सी ही,क्यों??

एक लड़की, एक बहु बन कर सारा घर है संभाले,
फिर भी वो बेरोजगार क्यों? 
ज़िंदगी का पूरा सफर सिर्फ दूसरे के लिए ही जीना है क्यों???
आखिर एक लडकी का जीवन इतना कठिन है क्यों??
जब ज़िंदगी एक मिली है, तो बार बार सोचना है क्यों??

मां बन कर बच्चों को संभाले, फिर सिर्फ पिता का नाम ही हर जगह आता है क्यों??
अच्छा करे तो पिता का नाम, फिर तानो में सिर्फ मां का नाम ही क्यों?
आखिर एक लडकी का जीवन इतना कठिन है क्यों??
जब ज़िंदगी एक मिली है, तो बार बार सोचना ही क्यों??

देवी या मां के रूप में पूजते है जिसको,
फिर बलात्कार के अपराध इतने होते है क्यों??
आखिर एक लडकी का जीवन इतना कठिन है क्यों??



वक्त की बात

     वक्त की बात

वक्त वक्त की बात है
आज दुख: की, तो कल फूलो वाली रात है।

एक डोली उठी, तारो वाली जगमगाती रात है।
तो कभी किसी अपने के साथ बीती, आखिरी रात है।

कोई रात अकेली कटी,
तो किसी से सालों बाद हुई मुलाकात है।

किसी रात में प्यार की मौत,
तो कभी किसी से हो रहे, प्यार की ये पहली रात है।

किसी के झूठे वादे,भी सच्चे
तो किसी के सच्चे वादे भी लगते, जैसे फीके जस्बात है।

कभी खुद अपनो की राख पर बैठ रोए सारी रात है,
कभी जश्न मे बीती पूरी रात है।

अपनो से मिले गम की सौगात है
तो कभी ग़ैर के साथ भी,अपनो वाली बात है।

कोई इंसान अच्छा या बुरा नहीं,
ये तो बस वक्त वक्त की बात है।

बुरे तो बस उसके हालात है,
आज दुख की तो कल खुशी वाली रात है।



दूरी भी जरूरी थी।

जब मै उसको खोना नहीं चाहती थी।
उसी पल में मैने उसको खो दिया,
एक प्यारा दोस्त या ज़िन्दगी
हर रिश्ते में उसी का नाम दिया।
मगर दूरी भी ज़रूरी थी।

सच कहूं तो दूरी ही जरूरी थी।
थोड़ी इस दिल की मज़बूरी
थोड़ी दिमाग की मंजूरी थी।
मैंने उसे तब खोया, जब 
वो मेरे लिए बहुत जरूरी थी।
मगर दूरी भी जरूरी थी।

आंसू छुपा लिए थे उससे
जब वो मेरे सामने खड़ी थी
और पूछा उसने क्या ? ये सब में मेरी मंजूरी थी।
और कह दिया,  मैंने कि हां
अलग होने में मेरी मंजूरी थी।
 मगर दूरी भी जरूरी थी।

कुछ इस क़दर अपने दिल की दूरी थी।
उस झूठ को सच मानना उसकी भी,
और मेरी भी मंजूरी थी।
कुछ ऐसी ये मज़बूरी थी
मगर दूरी भी जरूरी थी।

अलग होने पर अब उसका दिल भी राज़ी है
मगर इस दिल की चोट आज भी ताज़ी है

जुनून में सुकून 3

हेलो दोस्तो।

आज कहानी के इस हिस्से में जानेंगे की स्नेहा की डायरी पढ़ कर आदित्य के होश आखिर क्यों उड़ जाते है?

डायरी में स्नेहा के माँ -पापा की फोटो होती है, जिन्हे देख कर आदित्य के चेहरे का रंग उड़ जाता है।
जिसकी वजह ये होती है कि एक बार जब आदित्य युवावस्था में होता है। तब वो मस्ती-मस्ती में कार लेकर रोड पर निकल जाता है, और कार काफी तेज रफ्तार में चला रहा होता है। उसकी कार की रफ्तार इतनी तेज़ होती है कि दो इंसानों से उसकी कार टकरा जाती है। और आदित्य जब तक ब्रेक लगता तब तक उन दोनों को कार टक्कर मार चुकी होती है। वो सड़क के दूसरे किनारे पर खून में लथपथ पड़े थे। आदित्य ने जा कर देखना भी चाहा लेकिन उसके दोस्त उसे जबरदस्ती वहां से लेे गए ताकि कोई फस न जाये।
आदित्य उस डायरी में ये भी पढ़ता है कि स्नेहा को क्या पसंद है क्या नहीं... स्नेहा की पसंद और नापसंद के साथ-साथ स्नेहा की ज़िन्दगी के सारे बुरे वक़्त को पढ़ता है। और साथ में ये भी पढ़ता है कि स्नेहा चाहती है  उसकी एक बुक पब्लिश हो, और स्नेहा की मन की सारी बाते उस डायरी में लिखी होती है।

अगले दिन आदित्य उससे मिलने जाता है और स्नेहा परेशान हो रही होती है। आदित्य उसकी परेशानी की वजह पूछता है। स्नेहा उसे अपनी डायरी के बारे में बताती है की उसकी डायरी नहीं मिल रही, जिसे वो जान से लगा कर रखती है ।

आदित्य ना जाने क्यों मगर एक अनजाने डर की वजह से उसे ये नहीं बता पाता, की उसकी डायरी आदित्य के पास ही है, मगर वो स्नेहा को यकीन दिलाता है कि वो उसकी डायरी ज़रूर ढूँढ लेगा और वो परेशान ना हो। स्नेहा वापस से अपने काम पर जाने लगती है। लेकिन उसका मन काम में नहीं होता, क्यूंकि उसका दिल तो उस डायरी के बारे में ही सोचता रहता है।

कुछ दिन बाद स्नेहा का जन्मदिन आ जाता है। आदित्य स्नेहा को उसके जन्मदिन पर बाहर घूमने जाने के लिए पूछता है। लेकिन स्नेहा मना कर देती है। क्युकी बीमारी की वजह से उसकी पहले ही काफी छुट्टीयां हो चुकी होती है।
स्नेहा के मना करने पर आदित्य उससे ज़िद नहीं करता उल्टा उसकी बात को समझता है। और उसकी बात मान भी लेता है। लेकिन (डोमिनोज़) आउटलेट के मालिक को पैसे दे कर आउटलेट पर ही अच्छे से डेकोरेशन करवा देता है। स्नेहा जब अपने जन्मदिन वाले दिन आउटलेट पर पहुँचती है, सब उसको जन्मदिन की बधाई देते है। और आज उसे कोई भी काम करने के लिए नहीं कहा जाता। 

स्नेहा को हैरानी तो तब होती है, जब स्नेहा देखती है कि आदित्य जो खुद इतने पैसे वाले घर से है की अगर चाहे तो पूरा आउटलेट खरीद ले वो आदित्य आज उसकी जगह ऑर्डर लेने का काम कर रहा  है, जब स्नेहा आदित्य के पास जाती है तो आदित्य उससे पूछता है, "मैम आपका ऑर्डर प्लीस??"

स्नेहा की आंख में आंसू होते है, क्यूंकि उसको अभी तक किसी ने ऐसा ट्रीट नहीं किया होता, और आदित्य स्नेहा को उसकी डायरी दिखा के बोलता है, "ये लो तुम्हारा गिफ्ट", अपनी खोई हुई डायरी देख वह बहुत खुश होती है, और खुशी से आदित्य को गले लगा लेती है।

आदित्य कहता है कि एक और सरप्राइज है तुम्हारे लिए मगर उसके लिए तुम्हे एक इजाज़त देनी होगी और थोड़ा-सा  इंतज़ार करना पड़ेगा।  
स्नेहा पूछती है "इजाज़त कैसी?", तब आदित्य उससे पूछता है "मुझे कुछ दिनों के लिए अपनी डायरी दे सकती हो??, देखो तुम्हारी डायरी मैं पढ़ चूका हूँ, मगर कुछ ऐसा है जिसे तुम्हे देने के लिए मुझे तुम्हारी डायरी चाहिए होगी" अब स्नेहा भरोसा तो करने ही लगी थी, तो उसने आदित्य को डायरी सौंप दी, मगर अब सवाल आता है, कि आखिर ऐसा क्या था की आदित्य को उसके लिए स्नेहा की डायरी की ज़रूरत थी????
यह बात हम कहानी के अगले हिस्से में जानेगे।
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धन्यवाद 🙏



गुमनाम दोस्त

कोई तुमसे पूछे कौन हूं मैं, तुम कह देना कोई खास नहीं    एक दोस्त है पक्का कच्चा सा, एक झूठ है आधा सच्चा सा जस्बात से ढका  एक परदा है एक बहान...